मन मेरा स्वदेशी

स्वदेशी का अर्थ है- 'अपने देश का' अथवा 'अपने देश में निर्मित'। हमें यह समझना होगा कि देश में जो भी विकास अभी तक हुआ है, वह वास्तव में स्वदेशी के आधार पर ही हुआ है। किसी भी देश और वहां के लोगों का विकास तब तक संभव नहीं हैं जब तक की वो स्वदेशी नहीं अपना लेते हैं । किसी भौगोलिक क्षेत्र में जन्मी, निर्मित या कल्पित वस्तुओं, नीतियों, विचारों को स्वदेशी कहते हैं।


आज हमे श्री राम प्रसाद बिस्मिल जी की रचना यद् दिलाती हैं :

मर जाऊं तो भी मेरा , होवे कफ़न स्वदेशी


मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी

मर जाऊं तो भी मेरा, होवे कफ़न स्वदेशी


चट्टान टूट जाये , तूफ़ान घुमड़ के आये

गर मौत भी पुकारे, तो भी लक्ष्य हो स्वदेशी


मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी

मर जाऊं तो भी मेरा , होवे कफ़न स्वदेशी


जो गाँव में बना हो, जो गाँव में खपा हो

जो गाँव को बसाये , वह काम है स्वदेशी


मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी

मर जाऊं तो भी मेरा , होवे कफ़न स्वदेशी


जो हाथ से बना हो, या गरीब से लिया हो

जिस में स्नेह भरा हो, वह चीज़ है स्वदेशी


मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी

मर जाऊं तो भी मेरा , होवे कफ़न स्वदेशी


श्री रामावतार त्यागी जी की एक रचना भी हमे अपने स्वदेश की सोचने पर मजबूर करता हैं :

मन समर्पित, तन समर्पित,

और यह जीवन समर्पित।

चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।


माँ तुम्हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन,

किंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदन-

थाल में लाऊँ सजाकर भाल मैं जब भी,

कर दया स्वीकार लेना यह समर्पण।


गान अर्पित, प्राण अर्पित,

रक्त का कण-कण समर्पित।

चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।


माँज दो तलवार को, लाओ न देरी,

बाँध दो कसकर, कमर पर ढाल मेरी,

भाल पर मल दो, चरण की धूल थोड़ी,

शीश पर आशीष की छाया धनेरी।


स्वप्न अर्पित, प्रश्न अर्पित,

आयु का क्षण-क्षण समर्पित।

चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।


तोड़ता हूँ मोह का बंधन, क्षमा दो,

गाँव मेरी, द्वार-घर मेरी, ऑंगन, क्षमा दो,

आज सीधे हाथ में तलवार दे-दो,

और बाऍं हाथ में ध्वज को थमा दो।


सुमन अर्पित, चमन अर्पित,

नीड़ का तृण-तृण समर्पित।

चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।